प्रशासन की निष्पक्षता पर मोहाली से उठे सवाल

प्रशासन की निष्पक्षता पर मोहाली से उठे सवाल

Questions Raised from Mohali

Questions Raised from Mohali

संजीव वशिष्ठ का आरोप - क्या सत्ता के दबाव में काम कर रहा प्रशासन?

Questions Raised from Mohali: मोहाली नगर निगम चुनावों के बीच उठे पोस्टर और बैनर विवाद ने पंजाब की राजनीति में एक बार फिर प्रशासनिक निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। भाजपा के जिला अध्यक्ष संजीव वशिष्ठ ने आरोप लगाया है कि प्रशासन सुनियोजित तरीके से भाजपा और अन्य विपक्षी दलों की प्रचार सामग्री हटवा रहा है, जबकि आम आदमी पार्टी के बैनर और झंडे उसी क्षेत्र में बिना किसी रोक-टोक के लगे हुए हैं। उन्होंने इसे लोकतंत्र के साथ “खुला भेदभाव” बताते हुए राज्य चुनाव आयोग से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है।

सवाल केवल पोस्टर हटाने का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें सत्ता के करीब रहने वालों के लिए नियम अलग हो जाते हैं और विपक्ष के लिए अलग। यदि नगर निगम या प्रशासन अवैध विज्ञापन सामग्री हटाने की कार्रवाई कर रहा है, तो उसका दायरा सभी दलों तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। लेकिन यदि कार्रवाई केवल चुनिंदा राजनीतिक दलों पर केंद्रित दिखे, तो यह प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक पक्षपात प्रतीत होती है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका निष्पक्ष चुनावी वातावरण होता है। जनता तभी स्वतंत्र निर्णय ले सकती है जब सभी दलों को बराबरी का अवसर मिले। लेकिन जब सत्ता के संरक्षण में एक दल की प्रचार सामग्री सुरक्षित रहे और दूसरे दलों के पोस्टर रातों-रात हटाए जाएं, तब चुनावी मैदान बराबरी का नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में प्रशासन की निष्पक्षता पर संदेह होना स्वाभाविक है।

संजीव वशिष्ठ ने यह भी कहा कि यदि चुनाव आचार संहिता लागू है तो उसका पालन हर राजनीतिक दल पर एक समान होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने के लिए किया जा रहा है। यह आरोप इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पिछले कुछ समय से पंजाब में विपक्ष लगातार यह शिकायत करता रहा है कि सरकारी संस्थाओं का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अक्सर भाजपा पर संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाती रही है। लेकिन पंजाब में जब विपक्ष वही आरोप आप सरकार पर लगा रहा है, तब सत्ता पक्ष की चुप्पी कई सवाल पैदा करती है। लोकतंत्र में नैतिकता केवल भाषणों से साबित नहीं होती, बल्कि व्यवहार से दिखती है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि स्थानीय निकाय चुनाव केवल छोटे स्तर की राजनीति नहीं होते। यही चुनाव जनता के बीच सरकार की वास्तविक छवि तय करते हैं। यदि इन चुनावों में भी प्रशासन पर पक्षपात के आरोप लगने लगें, तो जनता का भरोसा संस्थाओं से कमजोर होने लगता है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयोग इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच करवाए और यदि कहीं प्रशासनिक पक्षपात हुआ है तो उस पर सख्त कार्रवाई करे। मोहाली का यह विवाद केवल बैनरों का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की परीक्षा का विषय बन चुका है। जनता सब देख रही है, और लोकतंत्र में अंतिम निर्णय हमेशा जनता ही सुनाती है।